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खेल – मनोरंजन

अनुशासनहीनता बताकर मुंह बंद करने का प्रयास

भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष के खिलाफ आरोप पर पहलवान फिर आक्रोशित

जसवंत क्लाडियस,तरुण छत्तीसगढ़ संवाददाता
हमारे देश में खिलाडिय़ों के साथ अन्याय, पक्षपात की खबरे स्वतंत्रता मिलने के पश्चात कभी-कभी रही हंै। एक समय था जब खेलकद के विभिन्न स्पर्धाओं के लिए बालिकाओं, युवतियों, महिलाओं के प्रोत्साहित करने की आवश्यकता होती थी। धीरे-धीरे अभिभावकों ने अपनी बेटियों को खेल प्रतियोगिताओं में शामिल होने के लिए घर से बाहर जाने की छूट दी। भारत में ऐसे अनेक खेल हैं जिनमें आज की परिस्थिति में कोई लिंग भेद नहीं है। महिला वर्ग की खिलाडिय़ों को अब घर-परिवार समाज द्वारा निंरतर बढ़ावा दिया जा रहा है। यही हाल केंद्र, राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों, विभिन्न औद्योगिक घरानों का है। व्यक्तिगत खेल प्रतियोगिता हो या दल आधारित भारतीय महिलाओं ने पिछले पचास वर्षों में शानदार प्रदर्शन करके भारत का नाम रौशन किया है। अंतर्राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में महिलाओं की भागीदारी निरंतर बढ़ती जा रही है। बालिकाएं व युवतियां आधुनिक काल में पहले की अपेक्षा कहीं अधिक पढ़ी लिखी हैं। वे अपना हित व अहित को समझने लगी है। इसकी वजह से से थोड़ा भी गलत होने पर वे आवाज उठाने के लिए तैयार रहती हैं। कुश्ती के खेल से जुड़ी महिला पहलवानों ने यौन उत्पीडऩ के विरूद्ध आवाज उठानी शुरू किया है। माता-पिता, अभिभावक अपने नौनिहालों को जब खेलों के माध्यम से उनकी प्रतिभा दिखाने के लिए खुले मन से तैयार हैं तभी कुश्ती के पहलवानों ने कुश्ती फेडरेशन के पुरुष प्रतिनिधियों के विरूद्ध आवाज उठाना शुरू कर दिया है। हमारे देश में महिला खिलाडिय़ों को प्रत्येक वर्ग सम्मान देता है। सरकार के प्रयास से उन्हें अत्याधुनिक प्रशिक्षण व संसाधन उपलबध कराये जा रहे हैं। जिसकी वजह से महिला पहलवानों ने ओलंपिक खेलों से लेकर सभी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत के लिए अनेक पदक जीते हैं। महिला पहलवानों ने खुद के साथ अखिल भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष द्वारा पिछले कई वर्षों किए जा रहे यौन शोषण को उजागर किया तथा न्याय की मांग के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर में तीन माह पूर्व धरना प्रदर्शन किया था। इस मांग की जांच के लिए कमेटी भी गठित की गई थी परंतु करीब तीन माह बाद कुछ निर्णय नहीं आने से वे अब फिर आंदोलित हो गए हैं। इस बार कपिल देव, नीरज चोपड़ा जैसे महान खिलाडिय़ों ने महिलाओं की मांग पर अपना सकारात्मक पक्ष रखा है। दूसरी तरफ भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा ने महिला पहलवानों की मांग पर टिप्पणी करते हुए एक खिलाड़ी के रूप में महान खिलाड़ी रही पीटी उषा ने उनके आंदोलन को देश में खेल वातावरण को दूषित करने वाला और अनुशासनहीनता तक कह डाला।
भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा ने पहलवानों पर टीका टिप्पणी तो की है पंरतु भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष के बारे में और जांच रिपोर्ट के खुलासे के बारे में अपना मुंह बंद रखा। स्पष्ट है पीटी उषा का बयान घाव में नमक छिड़कने जैसा है। धाविका से सांसद फिर सबसे बड़े खेल संघ के अध्यक्ष की बुलंदी पर पहुंचने वाली पीटी उषा महिला पहलवानों के आंदोलन से भारतीय खेल जगत को होने वाली हानि से अज्ञात है। कोई भी साधारण महिला यौन उत्पीडऩ का आरोप लगाने से पहले कई बार यह सोचती है कि इससे उसके पारिवारिक जीवन, समाज में उसकी कुछ भी इज्जत नहीं रह जाएगी फिर महिलाएं खुले आम आरोप लगा रही है तो फिर फेडरेशन के पुरुष अध्यक्ष के आचार, व्यवहार, चरित्र संदेहास्पद हो सकता है। अत: पीटी उषा को पहले या तो जांच कमेटी का निर्णय आने तक चुप रहना था या फिर उसे सार्वजनिक करते हुए महिलाओं को अनुशासनहीनता का पाठ पढ़ाना था। जो भी हो इस विवाद का जल्द अंत होना चाहिए अन्यथा दुष्परिणाम यह संभव है कि भारत में कोई भी अभिभावक अपनी लड़कियों के खेल में आगे बढऩे नहीं देगा।

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