कसावट के साथ मुकाबला करने में रहे असफल

महिला हाकी विश्वकप-2022, नीदरलैंड्स ने नौंवी बार खिताब पर कब्जा किया
– जसवंत क्लाडियस,तरुण छत्तीसगढ़ संवाददाता
किसी भी खेल की विश्व कप स्पर्धा का अपना महत्व है। टीम खेल हो या व्यक्तिगत मुकाबला प्रत्येक टीम या प्रतिभागी उसका विजेता बनना चाहता है। ओलंपिक खेलों में हॉकी का अपना विशिष्ट स्थान है। गत 1 से 17 जुलाई तक स्पेन तथा नीदरलैंड्स दो देशों की संयुक्त मेजबानी में 15वीं महिला हाकी विश्व कप का आयोजन किया गया। नीदरलैंड्स की टीम ने नौंवी बार विजेता होने का गौरव हासिल किया। इस प्रतियोगिता के लिए भारत की महिला हाकी टीम ने भी योग्यता हासिल की थी। हमारी टीम को वर्तमान में विश्व में 9वीं वरीयता प्राप्त है और 2022 के विश्व चैंपियनशिव में भारत ने नौंवा स्थान प्राप्त किया। 1974 से आरंभ हुए इस स्पर्धा में हमारे देश ने अब तक सिर्फ 8 बार भाग लिया है। 1974 में भारत की महिला हाकी टीम को चौथा, 1978 में सातवां, 1983 में ग्यारहवां, 1988 में 12वां, 2006 में 11वां, 2010 में 9वां, 2018 में 8वां जबकि 2022 में 9वां स्थान प्राप्त किया। अंतर्राष्ट्रीय हाकी फेडरेशन के द्वारा दुनिया के 77 देशों की महिला टीम को मान्यता दी गई है। विश्व योग्यता क्रम में भले ही हमारा स्थान 9वां है और इस मुकाबले में हमने नौवां स्थान पाया परंतु एशिया में भारतीय टीम का पहला स्थान है। इस सूची में चीन को दूसरा, जापान को तीसरा साथ ही कोरिया को चतुर्थ स्थान प्राप्त है। 2018 के विश्व कप में हमारी टीम को आठवां स्थान हासिल था। उस दृष्टि से इस बार कहीं अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी। हमारी महिला खिलाड़ियों के पास तैयारी के संंबंध में किसी तरह की कोई कमी बताने का मौका नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीति के कारण 2014 के बाद से भारत में खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाये गये हैं। उनके नेतृत्व में खेल एवं युवा कल्याण विभाग के मंत्री अनुराग ठाकुर ने भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) तथा हाकी इंडिया को खिलाड़ियों के प्रशिक्षण/अभ्यास के लिए भरपूर आर्थिक व तकनीकी मदद प्रदान की गई। कोरोना विषाणु के संक्रमण के बावजूद महिला टीम की तैयारी के लिए व्यवस्थित व सुरक्षित प्रशिक्षण शिविर लगाए गए। टीम को मानसिक व शारीरिक मजबूती प्रदान करने में विशेष ध्यान दिया गया लेकिन फिर भी नौंवा स्थान प्राप्त करना चिंता का विषय है। ऐसा भी नहीं है कि टीम में अनुभवी खिलाड़ियों की कमी रही। टीम की सदस्या फारवर्ड वंदना कटारिया को 264, गोलकीपर कप्ता सविता प्रधान के अलावा डिफेंडर दीप ग्रेस एक्का को 228, मिडफिल्डर सुशीला चानू को 208, नवजोत कौर को 196, मोनिका मलिक को 178, निक्की प्रधान को 127, डिफेंडर गुरजीत कौर को 112, मिडफिल्डर नेहा गोयल को 103 अंतर्राष्ट्रीय मैच में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिल चुका है। किसी टीम के नौ खिलाड़ियों के पास 100 से अधिक टूर्नामेंट में भाग लेने का अनुभव हो तो उनसे नौंवे से उपर स्थान पाने की उम्मीद रहती है। इस बार भी हमारे खिलाड़ियों ने डी के अंदर पास देने, गेंद को गोल पोस्ट में शूट करने, पेनाल्टी कार्नर को गोल में न बदल पाने की कमजोरी दिखाई। 6 मैच में भारत ने 1 जीता जबकि 3 मैच ड्रा रहे, दो में पराजित हुए। 6 मैच में विपक्षी पर सिर्फ 9 गोल किये और 8 गोल हमारी टीम पर हुए। अत: स्पष्ट है कि हमारी रक्षा पंक्ति भी कमजोर रही। सच्चाई तो यह है कि विश्व कप जैसे टूर्नामेंट में प्रत्येक खिलाड़ी का मनोबल ऊंचा होना चाहिए तभी संयम व धैर्य से आपसी तालमेल के माध्यम से विपक्षी पर सफलता प्राप्त होती है।

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